Wednesday, November 5, 2025

लक्ष लक्ष ज्योति

त्रिपुरारी पौर्णिमेनिमित्त आज सादर करत आहोत अंतरीच्या दिवाळीची आणखी एक कविता.. लक्ष लक्ष ज्योति

काव्य रचना: सौ. मेधा श्रीश कामत

लक्ष लक्ष ज्योति

आज त्रिपुरारी लावूया लक्ष लक्ष वाती

लखलखले विश्व, लक्ष लक्ष ज्योति

          पणती पहा इवलीशी उजळे प्रकाश

          करी जागृत संवेदना मनामनात संदेश

उजळूनीया दशदिशा तम लोपवी

देई प्रेरणा सकला स्वसामर्थ्ये तोषवी

          भरुनीया वाहे काठोकाठ आनंदे  सरीता

          आसमंत हर्षभरीत आरास ही पाहता

ना चिंतेचा मग मना लवलेश शिवे

जेव्हा विवेके  लावितो लक्ष लक्ष दिवे

          उजळता दिवे रोमरोम होई पुलकित

          प्रकटे नारायण येई अधिक सन्निध

शोभे नभीचा आकाशदीप तेजोमय

अवनीवरी नाचे हर्षॉल्हास आनंदमय

          करी क्रिडा दीपलक्ष्मी देई वरदान  

          सौन्दर्य सृष्टीचे, तेजाची की उधळण

सुसंस्कारे मायपित्याच्या करीतो आम्ही साजरे सण

भक्तित परमपित्याच्या होतो सदा रममाण

-                                                                       --सौ. मेधा श्रीश कामत